बस…’ये’, कहानी है :

shailyblog

बहुत पुरानी एक कहानी मेरी नानी कहतीं थीं,
किसी समय में,किसी जगह ‘कुछ चोरों’ की इक बस्ती थी.
 
मुखिया था जो, सब चोरों का ‘राज-पिता’ कहलाता था,
उसका ही परिवार अकेला, शासन-तंत्र चलता था.
 
बाद पिता के बेटी-बेटे,उस गद्दी के मालिक थे,
चलता था ‘सब -कुछ ‘ मिल-जुलकर,वे सब बे-हद ‘क़ाबिल’ थे.
 
पुत्र नहीं तो ‘पुत्र-वधू’ भी गद्दी की अधिकारी थी,
 जामाता, दौहित्र; पौत्रों.. की भी महिमा न्यारी थी.
  
लूट-पाट का सारा वैभवबाहर  जमा करते थे ,
‘काले-धन’ से सैर-सपाटा,बाहर  करने जाते थे ! 
 
बेचारे,बस्ती-वाले! सब सहमे-सहमे रहते थे,
हक़‘ छीना जाता था उनका ,वह चुपचाप झेलते थे.
 
धीरे-धीरे‘राज-धर्म”…भोली-जनता में उतर गया,
चोरी ही है “राष्ट्र-निति  जन-मानस में ये बैठ गया.
 
बजी दुन्दुभी चोरी की, भय(?)कोई नहीं सताया था !
 सभी निडर हो,चोरी करते

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