“आज का सच,आज की भाषा”

अब कौन किसी के घर जाना है,
सब कुछ phoneसे निबटाना है।
मारना-जीना,ईद-दीवाली,सब पर ,
Message पहुँचाना है।

पहले सफ़र बड़ा मुश्किल था,
मोटर,train,जहाज न थे।
Internet और phone कहाँ था?
डाक,डाकिये लाते थे।

आमन्त्रण के हल्दी-अक्षत,
पंडित -नाई लाते थे ।
Cycle,रिक्शा,तांगा-इक्का
ही,-यात्रा के साधन थे ।

फिर भी, बरही-तेरहवीं….
परिचित-परिवार पहुंचते थे।
हंसी-ख़ुशी या शोक-ग़मी
सब,मिल-जुल गाते-रोते थे।

मिली phone की सुविधा,
जबसे…
मिलाना-जुलना विरल हुआ,
तीज-पर्व और त्यौहारों पर,
जन-कोलाहल मंद हुआ।

सड़कें-गलियां सूनी हैं,
सूना गांवों का चौबारा ।
सभी phone पर लगे पड़े,
सूना लगता अब, घर पूरा।

Graphics अब संवाद..
Emoji(�😊😪)दर्शाते हँसना-रोना,
घर-बहार सब चुप-चुप हैं,
गूँजे…signal का- antenna .

घर तो हैं,comfort zone,
विचलित होते,मेहमानों से।
सबको message से टरकाना….
Browse करके Google से।

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